रानी लक्ष्मी बाई बायोग्राफी

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Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi: हमारा देश कई वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा है और फिर इस गुलामी से छुटकारा दिलाने के पीछे किसी एक का योगदान नहीं है बल्कि कई सारे वीरों और वीरांगनाओ का योगदान रहा है, और इन सबने अपनी भारत माता के लिए अपनी जान तक की परवाह नही की।

जिस वजह से आज हम एक स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं और किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ रही है लेकिन शायद हम अंदाजा नहीं लगा सकते कि हमारे भारत देश को आजाद कराने के लिए जिन्होंने भी अपनी जान की तक बाजी लगा दी वह कितने बड़े देशभक्त होंगे।

अगर आप भी एक देशभक्त हैं और आप भी अपनी भारत माता से प्यार करते हैं तो आपको पता होगा कि हमारे भारत देश को आजाद कराने के लिए कई सारे राजाओं और कई वीरांगना का योगदान रहा है इन वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मी बाई का नाम सबसे पहले आता है।

इसी वजह से आज हम आपको रानी लक्ष्मीबाई जीवनी बताने जा रहे हैं जिसको पढ़कर और रानी लक्ष्मी बाई के बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे क्योंकि इनकी वीरता का परिचय शायद ही कभी कोई दे पाए और शायद ही इतनी बड़ी वीरांगना फिर से हमारे भारत देश को मिल पाए। आज हम आपको इस आर्टिकल के जरिये Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi के बार में जानकारी देने की कोशिश कर रहे है।

रानी लक्ष्मी बाई बायोग्राफी: Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi

Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi
नाम                          मणिकर्णिका  ताम्बे  [ लक्ष्मीबाई  नेवलेकर ]
जन्म                        सन  1828
मृत्यु                          सन  1858
पिता                          मोरोपंत  ताम्बे
माता                        भागीरथी  बाई
पति                           महाराज  गंगाधर  रावनेवलेकर
संतान                       दामोदर  राव,  आनंद  राव
घराना                      मराठा  साम्राज्य

रानी लक्ष्मी बाई प्रारंभिक जीवनी और शिक्षा

इनका असली नाम मणिकर्णिका  ताम्बे था, और इनके विवाह के पश्चात इनका नाम रानी लक्ष्मी बाई पड़ा हालांकि प्यार से सब सदस्य मनु कहकर ही पुकारा करते थे, इनका जन्म 1828 को काशी में हुआ था, इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था जो की एक ग्रहणी थी और इनके पिता का नाम मोरपंत तांबे था जो की बिठूर में न्यायालय के पेशवा थे, इसी वजह से इनको अन्य लड़कियों की तुलना में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

इन्होंने अपनी शिक्षा के साथ साथ आत्म – रक्षा,  घुड़सवारी,  निशानेबाजी  और  घेराबंदी भी सीखा था, इन्होंने अपनी खुद की सेना भी तैयार की थी। इनकी माता का देहांत इनकी 4 वर्ष की अवस्था ने ही हो गया था, जिसके बाद इनका लालन पालन इनके पिता जी ने ही किया था।

रानी लक्ष्मी बाई का विवाह

 इनका विवाह बहुत जल्दी ही यानी की 1828, 14 वर्ष की अवस्था में  झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हो गया था, उस समय की परंपरा के मुताबिक इनका नाम बदलकर रानी लक्ष्मी बाई रखा गया। इसके बाद इनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम दामोदर राव था किंतु कुछ कारणों से दामोदर राव का देहांत मात्र 4 महीने में ही हो गया था।

इसके बाद गंगाधर राव अपने पुत्र के निधन से कभी उभर ही नही पाए और फिर 1853 में महाराजा बहुत ज्यादा बीमार पड़ गए तब जब फैसला लिया गया की इनके भाई के पुत्र को गोद लिया जाए और फिर ऐसा ही हुआ की इनके भाई के पुत्र को इन्होंने गोद लिया जिसका नाम आनंद राव था किंतु ये नाम बदलकर दामोदर राव रखा गया।गोद लिए गए उत्तराधिकारी पर कोई अंग्रेज विरोध न करे इस वजह से यह सारे कार्य ब्रिटिश अफसरों की उपस्थिति में संपूर्ण किए गए।

मेरी झांसी नही दूंगी

7 मार्च 1854 में ब्रिटिश सरकार ने एक सरकारी गजट जारी किया, इसके अंतर्गत यह था की झांसी को ब्रिटिश सरकार में मिलाने का आदेश दिया गया और यह सूचना ब्रिटिश अफसर एलिन द्वारा झांसी की रानी तक पहुंचाया गया जिसके बाद झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने साफ साफ इंकार कर दिया और कहां की मैं अपनी झांसी नही दूंगी। और देखते ही देखते यह विद्रोह का कारण बन गया,

इस विद्रोह में लड़ने के लिए लक्ष्मी बाई ने कई राज्यों से सेना की मांग की जिसकी मदद से इन्होंने एक सेना तैयार की जिसमे न सिर्फ पुरुष ही बल्कि महिलाए भी शामिल थी, इन सभी को प्रशिक्षण दिया गया और सबसे खास बात की इस सेना में बहुत से महारथी जैसे की  काशी  बाई,  लाला  भाऊ  बक्शी,  मोतीबाई,  दीवान  रघुनाथ  सिंह,  गुलाम  खान,  दोस्त  खान,  खुदा  बक्श,  सुन्दर – मुन्दर, दीवान  जवाहर  सिंह आदि शामिल थे।

इसके बाद अंग्रेजों ने नई बंदूकों की गोलियों में गौमांस को चढ़ाया जाने लगा, जो की हिंदुओं को बहुत बुरा लग रहा है और फिर इस कारण से हिंदुओ ने इसका विद्रोह की और इस विद्रोह से बचने के लिए अंग्रेजो ने झांसी को लेने से इंकार कर दिया किंतु सितम्बर – अक्टूबर, 1857 को झांसी की रानी को ओरछा  और  दतिया के राजाओं के साथ युद्ध लड़ना पड़ा, इसका कारण था की इन्होंने झांसी पर चढ़ाई कर दी थी।

इसके बाद 1858 में अंग्रेजो ने सर  ह्यू  रोज के नेतृत्व में झांसी पर आक्रमण किया जिसके विरोध में झांसी की ओर से तात्या टोपे ने 20000 सैनिकों के साथ युद्ध आरंभ किया, देखते देखते इस युद्ध को 2 हफ्ते बीत गए और फिर अंत में अंग्रेजो ने झांसी की दीवार तोड़ कर कब्जा करना शुरू कर दिया, नगर को लूटना शुरू किया और फिर झांसी को अपने कब्जे में ले लिया।

हालांकि झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जी अपने पुत्र दामोदर राव को लेकर किले से निकल गई, इस हार की वजह से इन्होंने 24  घंटों  में  102  मील का सफल तय किया, इनके साथ इनका दल और तात्या टोपे भी थे, इन सबने कालपी में शरण ली।

इसके बाद 22  मई,  1858  को  सर  ह्यू  रोज ने काल्पी ने हमला किया और अंग्रेजो को हार का सामना करना पड़ा किंतु इसके बाद फिर से सर  ह्यू  रोज ने हमला किया, जिसमे रानी लक्ष्मी बाई हार गई। इसके बाद रानी ने अपने दल और अन्य सदस्यों के साथ ग्वालियल पर कब्जा करने का निर्णय लिया जिसमे यह सफल हुई और फिर ग्वालियर को पेशवा के हवाले कर दिया।

रानी लक्ष्मीबाई की लोकप्रियता

Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi

रानी लक्ष्मी बाई को आज के समय हम सभी जानते है रानी लक्ष्मी बाई ने अपने जीवन में कई ऐसे महान काम किया है जिसकी वजह से आज के समय में लाखो लोग उनको जानता है और उनका नाम इतिहास के पन्नो पर दर्ज है

लक्ष्मी बाई एक सक्षम योद्धा रही थी कई युद्ध में विजेता हासिल किया है।
मरना कबूल कर दिया लेकिन झुकना कबूल नहीं किया।
गुनाहगारो को उचित सजा देने में पूरा प्रयास किया।
अग्रेजो के खिलाफ निडरता के साथ युद्ध किया।
मरने के बाद भी अपने मृत शरीर को अंग्रेजो को छूने नहीं दिया।

रानी लक्ष्मी बाई पर फिल्म

भारत की लक्ष्मी बाई जिनके जीवन पर फिल्म भी बॉलीवुड में बन चुकी थी और बहुत ही ज्यादा फिल्म लोकप्रिय साबित हुई लक्ष्मी बाई के जीवन पर आधारित फिल्म का नाम मणिकर्णिका ‘द क्वीन ऑफ झाँसी’ था। इस फिल्म को 2019 में रिलीज किया गया था।

रानी लक्ष्मी बाई मृत्यु

17 जून, 1858  में  किंग्स  रॉयल  आयरिश के खिलाफ युद्ध में इन्होंने अपने साहस का परिचय दिया, किंतु यह राजरतन नाम के जिस घोड़े पर सवार थी वह घोड़ा नहर कूदने में काबिल नही था, जिस वजह से इनको वहीं पर युद्ध लड़ना पड़ा और फिर यह हार गई हालांकि यह एक पुरुष के भेष में थी तो अंग्रेजो इनको नही पहचान पाए।

जिस वजह से रानी लक्ष्मी बाई के कुछ सैनिकों ने इनको बचाने का प्रयास किया जिसके लिए वह इनको गंगादास  मठ में लेकर गए, जहां पर इनको गंगा जल पिलाया गया और इन्होंने अपनी आखिरी इक्षा बताई और कहा की मेरी देह को कोई अंग्रेज अफसर हाथ न लगाए, जिसके बाद कोटा  की  सराई  के   पास  ग्वालियर  के  फूलबाग  क्षेत्र में इनकी मृत्यु हो गई।

निष्कर्ष

आज के आर्टिकल में हमने आपको Rani Lakshmi Bai Biography In Hindi के बारे में जानकारी दी है। हमें उम्मीद है, की हमारे द्वारा दी गयी जानकारी आपको बेहतरीन लगी होगी। यदि आपको हमारे इस आर्टिकल से जुड़ा हुआ कोई सवाल है तो आप हमें कमेंट में बता सकते है।